मुझे आदत नही बातों की कुछ कर दिखाना चाहती हूँ रात को रवि, धरती को स्वग्र बनाना चाहती हूँ।
मेरी मंजिल के दरवाजे भले ही बंद हैं हिम्मत और मेरे हौसले बुलंद हैं।
फनाह कर सकूं दरिंदों को ऐसी साजिश बनना चाहती हूं दिवाली में रंग में होली में आतिश चाहती हूं।
सामने मेरे पहाड़ बड़े या दीवारें कितनी ऊंची हो मुझ से टकराने वालों की आंखें हमेशा नीची हूं। जीत ना पाऊं फिर भी मुकाबला करना चाहती हूं। इतिहास के पन्नों में अपना भी नाम लिखना चाहती हूं।
क्यों हर रहा में हमें इतने काटे दिए है। क्यों हर मंथन के विष हमने पिए हैं ।
सहानुभूति का पात्र नहीं, मैं विश्वास चाहती हूं। ज्यादा कुछ नहीं बस थोड़ा सम्मान चाहती हूं ।
– सोनम शर्मा